प्रदेश का एक मात्र गांव, जहां तीज का पर्व महाभारत काल से बिना जात- पात व धर्म के संयुक्त रूप से मनाया जाता

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कैथल, 3 अगस्त (कृष्ण गर्ग)
प्रदेश का एक मात्र गांव, जहां तीज का पर्व महाभारत काल से बिना जात- पात व धर्म के संयुक्त रूप से मनाया जाता है। हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब को एक समान देख जाता है। शनिवार को भी यह त्यौहार हर साल की तरह सभी समुदायों, बिरादरी की महिलाओं ने झुला झूलकर तथा नाच गा कर मनाया। गांव के बिद्क्यार तालाब के किनारे बाबा महेश गिरी की समाधि स्थल पर यह त्यौहार मनाया जाता है। महिला बिमला, महैसो, शकुन्तला, कमला, राजो, बहोती, शानो, कृष्णा, प्रोमिला, करेसनी आदि ने बताया की तीज के त्यौहार को सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है। महाभारत काल से गांव में यह बिद््क्यार तालाब है और इसमें आज भी कांच की सीढिय़ां है। इस तालाब के किनारे कभी बाबा महेश गिरी तप किया करते थे। जिस कारण से इस समाध की विशेष महत्वता है। उन्होंने बताया की बेशक से गांव में आपस में मन मुटाव हो, परन्तु तीज पर इस समाध पर सब भुला दिया जाता है। अमीर- गरीब सब एक हो जाते है। उन्होंने बताया की गांव की सभी महिलायें अपने पालतू पशुओं को पानी पिला कर तथा चारा डाल कर सुबह से ही इस समाध पर एकत्र होना शुरू कर देती है। सावन के इस महीने में इस त्यौहार पर महिलाओं के मायके से कोथली आती है, उसमें आये समान जैसे बिस्कुट, फिरनी, घेवर तथा पतासें सब महिलायें यहां लाकर आपस में मिल जुल कर बांट कर खाती है। उन्होंने बताया की पहले हरसोला की तीज को देखने दूर दराज से लोग आया करते थे। उनकी कोथली भी दो दिन पहले आ जाने के बाद, इसको लाने वाला व्यक्ति भी इस त्यौहार को देखकर ही वापस जाता था। महिलायें इस त्यौहार का साल तक पड़ी बेसब्री से इंतजार करती रहती है। उन्होंने बताया की इस समाध पर कभी कई वृक्ष होते थे और महिलायें सारा दिन झुला झूलती रहती थी। अब इस समाध में अब वृक्ष कम हो गये, जिस कारण से महिलायें अब संस्कृति गानों पर नाच कर इस त्यौहार को मनाती है। उन्होंने बताया की इस दिन इस समाध में पुरुषों का आना वर्जित रहता है। किसी को अंदर नही आने दिया जाता। अब इस समाध पर कई नये वृक्ष भी लगाये हुये है, जो अभी छोटे है।
फोटो सहित

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