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सेवादारों को सरोंपे भेंट कर सम्मानित किया, संगत ने लंगर लगाया

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कैथल 06 जनवरी (कृष्ण गर्ग)
खालसा पंथ के संस्थापक श्री गुरु गोबिंद सिंह जी का 351 वां प्रकाशोत्सव जिलेभर के गुरुद्वारों में श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। गुरुद्वारों में शबद कीर्तन और अरदास हुई। सुबह से गुरुद्वारा में माथा टेकने आए श्रद्धालुओं की भीड़ रही। शुक्रवार को जगदीशपुरा गांव की संगत की ओर से गुरुद्वारा में रखे श्री अखंडपाठ साहिब का भोग पाया गया। इस मौके पर श्री निशान साहिब का चौला बदलने की सेवा भी की गई। गुरुद्वारा के ग्रंथी तरसेम सिंह ने शबद कीर्तन कर संगत को निहाल किया। वाहो वाहो गोबिंद सिंह आपे गुरु चेला।…. मां गुजरी दे चन्न वरगा चन्न होर कोई नही हो सकदा। मित्तर प्यारे नूं हाल मुरिदां दा कहिना गुरबाणी का गुणगान कर संगत को निहाल किया। तरसेम सिंह ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म पटना साहिब की धरती पर नौंवी पातशाही श्री गुरु तेग बहादुर जी के घर माता गुजरी की कोख से हुआ। नौ वर्ष की आयु में गुरु गोबिंद सिंह जी का परिवार आनंदपुर साहिब आ गया। गुरु जी ने छोटी ही उम्र में शस्त्र विद्या हासिल की और गुरु साहिब जी ने सन् 1699 को खालसा पंथ की स्थापना की। उस समय दिल्ली सल्तनत पर तैनात औरंगजेब के शासन में जनता पर अत्याचार हो रहे थे। हिंदूओं को धर्म परिवर्तन के लिए तंग किया जा रहा था। गुरु जी ने देश और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए सर्वंश कुर्बान कर दिया। सिख इतिहास कुर्बानियों से भरा है लेकिन आज की युवा पीढ़ी टीवी और मोबाइल में इतनी मग्न है कि उन्हें अपने इतिहास की भी पूरी जानकारी नहीं है। अभिभावक अपने बच्चों को संस्कारवान बनाएं और गुरु जी के दिखाए मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें। ज्ञान सिंह की ओर से सेवादारों को सरौपें भेंट कर सम्मानित किया। इस मौके पर गुरुद्वारा प्रधान जरनैल सिंह, अमरजीत सिंह,  प्रो. कशमीर सिंह, सुखचैन सिंह, सुखविंद्र सिंह, जसपाल सिंह, सुरेंद्र सिंह समेत सेवादार मौजूद थे।

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